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स्त्री- शक्ति का प्रतीक, संघर्ष की कहानी

नारी :- यह दो शब्दों से मिलकर बना है, परन्तु दो अक्षरों संपूर्ण ब्रम्हांड समाया है नारी की महिमा का बखान करना या उसको प्रस्तुत करना संभव नहीं है परन्तु नारी की परिभाषा इस समाज और इस दुनिया में क्या है हमारे सामने आज सबसे बड़ा प्रश्न चिन्ह यह है की जिस नारी के आगे ईश्वर भी शीश झुकाते है जिसे लक्ष्मी, सरस्वती तथा दुर्गा का हमारे पुराणों में दर्जा तथा सम्मान दिया गया है, उसकी हमारे समाज में क्या स्थिति है नारी समस्त पृथ्वी की जननी है वह प्राचीन काल से ही पुरूषों के द्वारा प्रताड़ित होती जा रही है । वह अनेक रूप में इस संसार का सृजन करती है तथा अपने दायित्वों को पूरा करती है । चाहें वह माँ, बहन या भार्या, नारी के कर्तव्यों का पालन करने एवं उसके त्याग तथा बलिदान करने की गाथा अत्यंत विस्तृत एवं विशाल है।  

समाज में नारी की स्थिति :- नारी की संवेदनाओं, वेदनाओं का और उसके समर्पण का हमारे इस भौतिकवादी समाज में कोई स्थान नहीं है वह हर युग में पुरूपों तथा समाजिक परम्पराओं द्वारा प्रताड़ित होती जा रही है चाहे वह नारी शिक्षित हो या अशिक्षित वह इस समाज में निरंतर प्रताड़ित होती जा रही है यदि नारी शिक्षित है वह अपने पैरों पर खड़ी है तथा अपने परिवार का पालन पोषण करती है वह अनेको तरह से योग्य है परन्तु विस्मय की स्थिति आज भी बनी हूई है एक स्त्री घर तथा बाहर की जिम्मेदारियो को अत्यधिक अच्छी तरह से निभाती है फिर भी वह दोषी क्यों सारा समाज उसके विरूद्ध क्यों यदि वह ऑफिस में हंसकर बोले या किसी सहकर्मी से बात भी करले तो उसके चरित्र में क्यूँ दाग लगाया जाए उसके घर से आने जाने पर क्यूँ पाबंदी लगाई जाती है क्या उसे इस समाज इस दुनिया में खुल के जीने का अधिकार नहीं है वह अपनी स्वेच्छा से कब जीवन व्यतीत करेगी कब तक वह समाज दुनिया को तथा पुरूषों द्वारा केवल उसे वस्तु ही समझा जाता है जिसे जब चाह परेशान करों उसकी आत्मा उसके शरीर पर हजारों घाव दो क्योंकि उसे तो दर्द सहने की आदत सी पड़ गयी है आज दुनिया के हर क्षेत्र में नारी का शोषण तथा उसपे अत्याचार हो रहे है, स्कूल, कालेज ऑफिस कोई भी जगह उसके लिए सुरक्षित नहीं है यहाँ तक की घर भी नहीं, ऐसी स्थिति में वह कहाँ जाए क्या करें यदि किसी पुरूष द्वारा नारी का शोषण किया जाता है तब भी समाज द्वारा नारी को ही दोषी क्यूँ माना जाता है। उसके चरित्र पे क्यूँ ऊँगली उठाई जाती है । क्यूँ उसे यह एहसास दिलाया जाता है की वह अपवित्र है । इस समाज में रहने योग्य नहीं है ।  सर्वप्रथम मैं समाज तथा महिलाओं की समाज में स्थिति तथा उनकी परिभाषा का वर्णन करना चाहूंगी।

समाज :- समाज का तात्पर्य व्यक्तियों के समुह से है जो परस्पर सहयोग की भावनाओं को मानना उनका परम कर्तव्य हैं। समाज एक व्यक्ति के जीवन में सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। समाज के बीना कोई भी मनुष्य पशुतुल्य है । 

समाज में नारी की स्थिति :- भारतीय समाज प्रारंभ से ही रूढ़ीवादी समाज रहा है। जिसमें मुख्यतः स्त्रियों के लिये अत्यधिक नियम बनाये गये है। जिसका उन्हें अनिवार्य रूप से पालन करना होता है। हमारे इस रूढ़ीवादी समाज में नारी की स्थिति दिन प्रतिदिन गिरती जा रही थी बाल विवाह, सती प्रथा, कन्या भ्रूणहत्या आदि कुप्रथाएं हमारे समाज में प्रचलित थीं । परंतु स्वतंत्रता प्राप्ती के पश्चात तथा आधुनिक युग में शिक्षा के प्रचार प्रसार तथा सामाजिक कार्यकर्ताओं के द्वारा इन कुप्रथाओं का अन्त हुआ । एवं शासन द्वारा महिलाओं के हित के लिये अनेक योजना एवं विभाग बनाये गये जिससे महिलाओं को उनका विशेष अधिकार तथा सम्मान मिलें । आज के युग में महिला शिक्षित है वह घर एवं बाहर दोनों की जिम्मेदारी निभाती है । तथा राजनिति में भी अपना विशेष वर्चस्व स्थापित किया है । 

अतः मैं स्पष्ट करना चाहूँगी कि  आज नारी कई प्रशासनिक सेवा पर कार्यरत है परन्तु उन्हें हमेशा पुरूषों की अपेक्षा हर क्षेत्र में कम दर्जा दिया जाता है जबकि ईश्वर भी अपने नाम के आगे अपनी अर्धांगिनी का नाम जोड़ते हैं जैसे लक्ष्मी-नारायण, सीता-राम, शिव-पार्वती, शिव तो शक्ति के बिना शव के तुल्य है, फिर एक हाड़ मांस के पुतले पुरूष में इतना अहंकार क्यूँ यह एक प्रश्न चिन्ह रहेगा की हमारा समाज नारी की संवेदनाओं का सम्मान नहीं करता नारी के समक्ष तो ईश्वर भी अपना शीश झुकाते हैं और पुराणों में भी नारी को शक्ति स्वरूपा माना गया है तो हमारे भौतिकवादी समाज में स्त्री की स्थिति विचार करने योग्य है इसका जिम्मेदार कौन है ? नारी की सुरक्षा अब भी एक महत्वपूर्ण प्रश्न है वह चीख चीख कर कह रही है हमें इन्साफ दो हमें इन्साफ दो? हमारे अधिकारों का सम्मान करो ।