A happy couple sharing a moment, smiling and gazing into each other's eyes with love and joy.

रमा और भारत दर्शन

दक्षिण भारत के गाँव की लड़की रमा की शादी लंदन में रहने वाले विजय से हो जाती है।

गाँव में रहकर सारी लड़कियाँ विदेश घूमने के सपने सजाती थीं कि कोई NRI आए और उनसे उनकी शादी हो जाए। पर रमा ऐसा नहीं सोचती थी। उसकी चाहत, उसके सपने तो कुछ और ही थे।

शादी से लेकर विदाई तक, विदाई से लेकर ससुराल तक रमा के चेहरे पर सच्ची मुस्कान नहीं थी।

विजय को शादी वाली रात ही पता चल गया था।

विजय ने पूछा, “क्या हुआ? तुम खुश नहीं हो? क्या तुम यह शादी नहीं करना चाहती? तुम्हें क्या चाहिए?”

“मैंने एक अच्छी लड़की देखी, वह मुझे दिल से पसंद आ गई। विदेश में मैं अकेला था। इतने सारे दोस्त पास थे, सब कुछ होते हुए भी मैं अधूरा था। तुम्हें देखते ही ऐसा लगा, सब कुछ पूरा हो गया। जैसी जीवनसंगिनी चाहता था, वैसे ही मिल गई।”

“जब मैं तुम्हें देखने आया था तो मैंने तुमसे पूछा भी था, लेकिन तुमने शादी के लिए हाँ कह दी। मैंने तुमसे पूछा था कि तुम क्या चाहती हो, तुम्हारे सपने, तुम्हारी इच्छा, लेकिन तुमने कुछ नहीं बताया।”

“अब चुप क्यों हो? तुम्हें मैं पसंद नहीं? तुम्हें क्या चाहिए?”

रमा मुस्कुराकर कहती है, “आप जैसा जीवनसाथी नसीब वालों को मिलता है, क्योंकि हमारे गाँव में, हमारे परिवार में आज तक ऐसे किसी ने मुझसे नहीं पूछा कि मुझे क्या चाहिए, मैं क्या चाहती हूँ।”

विजय कहता है, “मैं वही तो जानना चाहता हूँ। मैं तुम्हारी खुशी चाहता हूँ।”

रमा जब से लंदन आई है, बस सारा दिन घर का काम, घंटों छत पर पक्षियों को निहारना, अपने आप में खोई-खोई रहना, परिवार के साथ बातें करते हुए और एक अच्छी बहू का पूरा दायित्व निभाते हुए भी उसके चेहरे पर सच्ची मुस्कान नहीं थी।

विजय रमा से रोज पूछता, लेकिन जब वह कोई जवाब नहीं देती, मुस्कुराकर टाल देती।

विजय कहता है, “सारा दिन तुम घर का काम करती हो, सबकी बात मानती हो, लेकिन खुद के बारे में नहीं सोचती। चलो, आज मैं तुम्हें लंदन घुमाता हूँ। तुम्हारा भी कोई सपना होगा।”

जैसे विजय रमा का हाथ पकड़कर तैयार होने को कहता है, रमा कहती है, “मुझे नहीं जाना। लंदन घूमना, देखना, यह मेरा सपना नहीं है।”

“मैं यह नहीं कह रही कि लंदन अच्छा नहीं है। दुनिया का हर शहर अच्छा है। मैं तो कभी अपने गाँव से बाहर ही नहीं गई। हम तो गाँव के आसपास के मंदिर, मेले ही घूम लेते थे।”

विजय रमा की तरफ बड़ी आँखों से देखने लगता है।

“अब मैं क्या करूँ? दुनिया का हर पति चाहता है अपनी पत्नी को घुमाए, शॉपिंग कराए। तुम्हें कहाँ लेकर जाऊँ?”

रमा कहती है, “मेरा बचपन का सपना है, जो मैंने आज तक किसी को नहीं बताया।”

“मुझे भारत की कला-संस्कृति से बहुत प्रेम है। मैंने बचपन में भरतनाट्यम सीखा, लेकिन पिताजी ने कहीं बाहर जाकर डांस प्रोग्राम करने की इजाज़त नहीं दी। मेरी पढ़ाई भी अधूरी रह गई।”

“लेकिन फिर भी मैं खुश थी, क्योंकि मेरी कला, मेरे सपने मेरे साथ थे। मैं खुद के लिए नाच लिया करती, पेड़-पौधों के बीच, नदी किनारे खुद से बातें करती थी, उड़ती थी, नाचती थी, गाती थी। अपने सपने को जीती थी।”

विजय प्यारी-सी मुस्कान के साथ रमा को देखता रह जाता है।

“अब बता भी दो, तुम्हारा क्या सपना है?”

रमा कहती है, “मेरा सपना भारत दर्शन का है। भारत भ्रमण का है। मैं अपने देश को देखना चाहती हूँ। अपने देश को जानना चाहती हूँ। भारत की मिट्टी की खुशबू को महसूस करना चाहती हूँ। भारत की कला-संस्कृति बहुत करीब से जानना चाहती हूँ।”

“मुझे मेरे देश से मिलवा दीजिए। मुझे भारत दर्शन करवा दीजिए। यह मेरे लिए सबसे अनमोल तोहफा होगा।”

अब तो विजय तालियों के साथ रमा का स्वागत करता है।

“वाह रमा! तुम जैसी ऊँचे विचारों वाली लड़की से मेरी शादी हुई है। मुझसे ऐसा खुशकिस्मत तो दुनिया में कोई नहीं होगा।”