Our Story
एक अयोग्य शिक्षक और एक योग्य छात्रा देवांश्री
दुनिया में सबसे ज्यादा भरोसा लोग एक शिक्षक पर करते हैं। उसकी शिक्षा पर करते हैं और उसकी
ऐसे ही एक छात्रा की विजय की कहानी है, जिसकी सरलता को उसी के क्लास टीचर ने उसकी कमजोरी समझ लिया था।
तो चलिए, एक योग्य छात्रा देवांश्री की कहानी की ओर।
देवांश्री नौवीं कक्षा की छात्रा है। पढ़ाई में, जनरल नॉलेज में और सभी विषयों में बहुत ज्यादा काबिल और होनहार है।
लेकिन कभी-कभी पारिवारिक वातावरण के चलते बहुत सारे बच्चों को बहुत कुछ सहना पड़ता है। उसके माता-पिता के झगड़े, माँ की लगातार खराब होती तबीयत और उसके ऊपर जिम्मेदारियों का बोझ, मानसिक रूप से भी उसे परेशान कर रहा था।
वह स्कूल गैप करके आती थी। एग्जाम और टेस्ट नियमित दे रही थी, लेकिन पहले की तरह नंबर नहीं आ रहे थे। उसके अंक कम हो गए थे।
तो ऐसे में एक शिक्षक का क्या कर्तव्य और दायित्व होना चाहिए? क्या उसे डाँटना चाहिए या उसकी परिस्थिति को समझकर उसका हौसला बढ़ाना चाहिए?
तो आइए, मिलते हैं ऐसे ही एक शिक्षक से, जिनका नाम है कर्मवीर सक्सेना।
कर्मवीर सक्सेना देवांश्री को बहुत बुरी तरह डाँटते थे। उसके कम नंबर आने पर ताने मारते थे। स्कूल में उसकी उपस्थिति पूरी तरह नियमित नहीं थी, लेकिन वह टेस्ट और परीक्षाएँ नियमित देती थी।
जब किसी घर की परिस्थिति बिल्कुल अच्छी नहीं थी, तब इस होनहार छात्रा ने हिम्मत करके उस स्थिति का सामना किया। परीक्षा में पास भी हो गई, लेकिन उसे एवरेज स्टूडेंट कहकर ताने मारे जाते थे। बात-बात पर प्रिंसिपल के पास ले जाने की धमकी दी जाती थी। दो-तीन बार प्रिंसिपल के ऑफिस में ले जाकर खड़ा भी कर दिया गया।
लेकिन उस योग्य छात्रा की हिम्मत देखिए।
घर में भी पारिवारिक वातावरण से परेशान थी और स्कूल में भी, लेकिन उसने अपना संयम नहीं खोया। अपने कर्तव्य और शिक्षा, दोनों को निभाया।
कर्मवीर सक्सेना ने उसे बार-बार तोड़ने और मानसिक रूप से प्रताड़ित करने का प्रयास किया। यहाँ तक कह दिया कि उसे परीक्षा में बैठने नहीं दिया जाएगा।
लेकिन वह पढ़ती रही और आखिरकार परीक्षा में बहुत अच्छे नंबरों से पास हुई।
एक बार फिर शिक्षक ने उसके माता-पिता को भी बुलवाया था। पिताजी ने कहा कि उसकी माँ की तबीयत ठीक नहीं रहती, इसलिए वह बीच-बीच में स्कूल नहीं आ पाई थी। अब वह नियमित स्कूल आएगी।
शिक्षक माता-पिता के सामने तो चिकनी-चुपड़ी बातें करते, लेकिन उनके पीछे छात्रा को मानसिक रूप से प्रताड़ित करते थे।
छात्रा को बहुत सारे कॉम्पिटिशन और डिबेट के चयन से भी रोक दिया जाता था।
क्या ऐसे शिक्षकों को विद्यार्थियों का भविष्य सँवारने वाला कहा जा सकता है?
अब देवांश्री दसवीं कक्षा की छात्रा है। क्लास और क्लास टीचर, दोनों बदल गए हैं।
लेकिन कर्मवीर सक्सेना सर इत्तेफाक से दसवीं कक्षा में भी उसके शिक्षक बन गए। वहाँ वह केवल एक विषय के शिक्षक हैं, लेकिन वहाँ भी उसे प्रताड़ित करने और नीचा दिखाने का कोई मौका नहीं छोड़ते।
अब वह उसके क्लास टीचर भी नहीं हैं, जहाँ हर बात पर उन्हें सफाई देनी पड़े। उनका काम सिर्फ एक विषय पढ़ाना है, लेकिन दसवीं कक्षा में भी वह देवांश्री को बहुत परेशान कर रहे थे।
जबकि अब देवांश्री नियमित स्कूल आ रही थी। उसका पारिवारिक वातावरण भी ठीक हो गया था। उसकी मम्मी की तबीयत भी ठीक हो गई थी।
लेकिन कर्मवीर सक्सेना सर का व्यवहार नहीं बदला।
एक दिन अचानक प्रिंसिपल देवांश्री की कक्षा में आ जाते हैं। सारे बच्चे खड़े हो जाते हैं। प्रिंसिपल किसी और विषय पर बात कर रहे होते हैं। तभी कर्मवीर सक्सेना सर उनसे कहते हैं,
“देखिए सर, यह बच्ची नियमित क्लास नहीं आती। इसके नंबर कम आते हैं।”
बताइए, ऐसे में देवांश्री को क्या करना चाहिए था?
क्या प्रिंसिपल से शिकायत करनी चाहिए थी? क्या अपने माता-पिता को बताना चाहिए था?
लेकिन देवांश्री को पता था कि यदि वह शिकायत करेगी भी, तो शायद शिक्षक का ही पक्ष लिया जाएगा। प्रिंसिपल भी विद्यार्थियों की बात नहीं सुनते थे।
अब देवांश्री ने सोचा, यदि मैं सब कुछ सहती रही, तो ये सर मुझे और परेशान करेंगे। और अगर मम्मी-पापा को बताया, तो बात और बढ़ जाएगी।
तो आखिर क्या किया जाए?
देवांश्री के क्लास टीचर अभय सर बहुत ही शिक्षित और सभ्य व्यक्ति थे। वे विद्यार्थियों को बहुत सारी कहानियाँ और कविताएँ सुनाया करते थे, जिनसे बच्चे बहुत कुछ सीखते और समझते थे।
देवांश्री ने अपनी सारी परेशानी अभय सर को बता दी, बिना प्रिंसिपल से शिकायत किए।
अब अभय सर ने देवांश्री को प्रोटेक्ट करना शुरू कर दिया। उन्होंने कर्मवीर सक्सेना से साफ-साफ कह दिया,
“यह मेरी क्लास है, यह मेरी छात्रा है। मैं इसका क्लास टीचर हूँ। आप अपने दायरे में रहिए।”
कर्मवीर सक्सेना ने टेस्ट में जो कम अंक दिए थे, उन्हें भी ठीक करवाया गया और उन्हें सख्त हिदायत दी गई कि आगे से ऐसा नहीं होना चाहिए।
स्कूल में एक बहुत बड़ा कार्यक्रम आयोजित हुआ। भाषण प्रतियोगिता में विद्यार्थियों को अपनी पसंद का विषय चुनकर भाषण देना था। दसवीं कक्षा से देवांश्री का चयन हुआ।
पूरा स्कूल, आयोजन समिति और दिल्ली से आए अतिथिगण भी वहाँ उपस्थित थे।
देवांश्री ने “योग्य शिक्षक” विषय पर अपना व्याख्यान प्रस्तुत किया।
उसने एक बहुत ही महत्वपूर्ण प्रश्न उठाया,
“हम हमेशा योग्य विद्यार्थी ढूँढ़ते हैं, लेकिन क्या हमारे जीवन में एक योग्य शिक्षक का होना भी उतना ही जरूरी नहीं है? क्या इस पर भी हमें गौर नहीं करना चाहिए?”
इसके बाद देवांश्री ने बड़े आत्मविश्वास और पूरे सम्मान के साथ प्रिंसिपल की आँखों में आँखें डालकर अपनी पूरी कहानी सुनाई।
उसने अपने साथ हुई हर परेशानी को सबके सामने रखा। डाँट-फटकार, मानसिक प्रताड़ना, जानबूझकर कम नंबर देना और बार-बार अपमानित करना, उसने अपनी कहानी के माध्यम से सब कुछ बयां कर दिया।
पूरा क्लास, आयोजन समिति और वहाँ उपस्थित अतिथिगण उसकी बातें सुनकर हैरान रह गए।
देवांश्री ने मंच से यहाँ तक कह दिया,
“मेरी कहानी के अनुसार, असलियत में विद्यार्थियों के साथ भेदभाव करने वाले और उन्हें परेशान करने वाले ऐसे शिक्षक भी हमारे स्कूल में हैं। यदि किसी शिक्षक ने विद्यार्थियों के साथ ऐसा किया है, तो उन्हें इस मंच पर आकर अपनी गलती स्वीकार करनी चाहिए।”
कर्मवीर सक्सेना भी यह सब सुन रहे थे। वह सोच में पड़ गए कि ऐसा भी हो सकता है।
इतने में स्कूल के सामने, सभी शिक्षकों के सामने एक ऐसी घटना हुई, जिसने कर्मवीर सक्सेना को सोचने पर मजबूर कर दिया।
उनकी बेटी भी उसी स्कूल में आठवीं कक्षा में पढ़ती थी। पढ़ाई में वह कमजोर थी और खेल-कूद में भी बहुत अच्छी नहीं थी। उसके क्लास टीचर उसे बहुत बुरी तरह डाँट रहे थे और उसके साथ गलत व्यवहार कर रहे थे।
कर्मवीर सक्सेना यह सब देख रहे थे।
उसी समय उन्हें एहसास हुआ कि उन्होंने देवांश्री के साथ कितना गलत व्यवहार किया था।
जिस दर्द और प्रताड़ना को उन्होंने अपनी बेटी के सामने देखा, उसी दर्द को देवांश्री भी उनके कारण सह चुकी थी।
कर्मवीर सक्सेना ने प्रिंसिपल और सभी शिक्षकों के सामने अपनी गलती स्वीकार की।
उन्होंने देवांश्री की योग्यता और उसके साहस की प्रशंसा की। उन्होंने उसके लिए तालियाँ भी बजाईं।
दिल्ली से आए अतिथिगण, प्रिंसिपल और सभी छात्राओं ने देवांश्री का सम्मान किया।
देवांश्री को दिल्ली में पुरस्कृत करने के लिए भी बुलाया गया।
तो यह थी देवांश्री जैसी योग्य छात्रा की कहानी, जो सभी विद्यार्थियों के लिए प्रेरणा है।
यह कहानी एक साथ बहुत सारी शिक्षा देती है।
हर बार विद्यार्थियों में योग्यता ढूँढ़ना ही पर्याप्त नहीं है। एक शिक्षक का भी योग्य होना उतना ही जरूरी है, जितना एक विद्यार्थी का योग्य होना।
और कहते हैं ना, यदि किसी की बेटी के साथ गलत करोगे, तो वह आपकी बेटी के साथ भी हो सकता है।
वैसा ही व्यवहार और वैसी ही प्रताड़ना कर्मवीर सक्सेना की बेटी के साथ भी हुई।
इसलिए किसी की बेटी के साथ दुर्व्यवहार करने से पहले सौ बार सोचना चाहिए।