Our Story
नकल की राह पर खो गई पहचान
ज़िंदगी में सबसे बड़ी ठोकर तब लगती है, जब हम नकल की राह पर चल पड़ते हैं। दुनिया में हर व्यक्ति
दुनिया में हर व्यक्ति अलग है। हर किसी की अपनी एक शैली है। यदि आप खुद की शैली भूलकर, खुद को खोकर नकल को ही पूरी ज़िंदगी बना लेंगे, तो आगे चलकर ऐसी ठोकर लगेगी कि कभी उठ नहीं पाएंगे।
कविता एक लेखिका थी। उसकी लेखनी बहुत ही प्रभावशाली थी। वह सरल शब्दों में ऐसी बातें लिखती थी, जो सीधे लोगों के दिल तक पहुँच जाती थीं।
उसकी कहानियों में उसकी सोच की गहराई और भावनाओं की सच्चाई दिखाई देती थी। वह किसी की नकल नहीं करती थी। अपने अनुभवों और अपनी सोच को अपनी शैली में लिखती थी।
धीरे-धीरे उसकी कहानियाँ लोगों के बीच लोकप्रिय होने लगीं।
नैना नाम की एक लड़की उसकी रचनाएँ पढ़ती थी। उसे कविता की लेखनी बहुत पसंद थी। शुरुआत में वह कविता से प्रेरणा लेती थी और खुद भी अच्छा लिखने का प्रयास करती थी।
लेकिन धीरे-धीरे प्रेरणा नकल में बदल गई।
कविता जिस तरह लिखती, नैना भी उसी तरह लिखने लगी। कविता जिस तरह अपनी बात शुरू करती, नैना भी वैसी ही शुरुआत करने लगी। यहाँ तक कि उसकी भाषा और प्रस्तुत करने के अंदाज़ को भी हूबहू अपनाने लगी।
कुछ समय तक नैना को इसका फायदा मिला। लोग उसकी रचनाओं को पसंद करने लगे और उसे लगा कि उसने सफलता का रास्ता खोज लिया है।
लेकिन यह रास्ता ज्यादा दूर तक नहीं चल सका।
एक दिन शहर में एक बड़ी लेखन प्रतियोगिता आयोजित हुई। विषय था:
“मेरी अपनी पहचान”
नैना ने भी प्रतियोगिता में हिस्सा लिया। उसे पूरा विश्वास था कि वह अपनी लिखने की शैली के कारण अच्छा प्रदर्शन करेगी।
वह कागज़ लेकर बैठी और लिखना शुरू किया।
लेकिन कुछ ही मिनटों बाद उसका हाथ रुक गया।
विषय था: “मेरी अपनी पहचान”, और वह सोचने लगी कि आखिर उसकी अपनी सोच और उसकी अपनी शैली क्या है?
किसी और की शैली में लिखना उसे आता था, लेकिन अपने मन की बात अपनी भाषा में लिखना वह भूल चुकी थी।
उसने कई बार लिखने की कोशिश की। फिर कविता की तरह लिखने लगी। उसे लगा कि इसी तरह लिखने से वह अच्छी कहानी तैयार कर लेगी।
प्रतियोगिता का परिणाम आया।
नैना को पुरस्कार नहीं मिला।
निर्णायकों ने उसकी रचना के बारे में कहा:
“आपकी लेखनी में क्षमता है, लेकिन आपकी रचना में आपकी अपनी आवाज़ दिखाई नहीं देती।”
यह बात नैना को अंदर तक चोट कर गई।
उस दिन उसे समझ आया कि जिस शैली को वह अपनी ताकत समझ रही थी, वह वास्तव में उसकी अपनी थी ही नहीं।
कुछ समय तक किसी की नकल करके आगे बढ़ा जा सकता है, लेकिन जब अपनी प्रतिभा, अपनी सोच और अपनी शैली की जरूरत पड़ती है, तब नकल की राह ठोकर बन जाती है।
नैना घर लौटी। उसने अपनी पुरानी रचनाएँ पढ़ीं और पहली बार महसूस किया कि दूसरों की तरह बनने की कोशिश में उसने खुद के अंदर की रचनात्मकता को पीछे छोड़ दिया था।
अगले दिन वह कविता से मिली।
कविता ने उससे कहा:
“मुझसे प्रेरणा लो, मेरी तरह बनने की कोशिश मत करो। तुम्हारे अंदर भी बहुत कुछ ऐसा है, जो सिर्फ तुम्हारा है। उसे पहचानो और उसी को अपनी लेखनी बनाओ।”
नैना ने उस दिन से दूसरों की नकल करना छोड़ दिया।
उसने लिखना जारी रखा, लेकिन अब वह अपनी सोच, अपने अनुभव और अपनी भाषा में लिखती थी।
धीरे-धीरे उसकी लेखनी में एक अलग मिठास और प्रभाव दिखाई देने लगा।
तब उसे समझ आया:
दूसरों की शैली आपको कुछ दूर तक ले जा सकती है, लेकिन लंबे सफर के लिए आपकी अपनी सोच, आपकी अपनी कला और आपकी अपनी शैली ही जरूरी है।
किसी का अनुसरण करना, प्रेरणा लेकर आगे बढ़ना बहुत अच्छी बात है।
लेकिन पूरी तरह से खुद को ignore करके, खुद की कला और खुद की शैली को ignore करके दिखावा करना गलत है।
और यह बात बहुत ज्यादा महत्वपूर्ण है।
हम दूसरों से सहयोग की अपेक्षा रखते हैं कि हमें support मिले,
लेकिन जब किसी और को support करने की बारी आती है, तो हम पीछे हट जाते हैं।
जैसा सहयोग हम दूसरों से चाहते हैं, वैसा ही सहयोग हमें दूसरों को भी देना चाहिए।
जितना दिया है, वैसा ही देना सीखिए।
क्योंकि सहयोग तभी मजबूत बनता है, जब वह दोनों तरफ से आता है।
अनुसरण करना, किसी से प्रेरणा लेना बहुत अच्छी बात है, लेकिन नकल करके खुद की पहचान खो देना उचित नहीं है।