Our Story
Introvert की दुनिया
आज के समय में बहुत से teenagers और youth में एक बदलाव देखने को मिल रहा है। कई घरों में माता-पिता अपने
आज के समय में बहुत से teenagers और youth में एक बदलाव देखने को मिल रहा है।
कई घरों में माता-पिता अपने बच्चों को लेकर परेशान रहते हैं:
“हमारी बेटी किसी से खुलकर बात नहीं करती।”
“वह अपनी परेशानी हमें बताती नहीं।”
“लोगों के बीच जाने से पहले बहुत सोचती है।”
और कई युवा खुद अपने माता-पिता और परिवारजनों से ही कह देते हैं:
“हम Introvert हैं।”
लेकिन Introvert होने का अर्थ अपनों से दूर होना नहीं है।
कई बार असली दूरी दूसरों से नहीं, खुद से बनने लगती है।
ऐसी ही एक लड़की थी, Tanya।
Teenage की शुरुआत में Tanya को अपनी दुनिया बहुत अलग लगने लगी थी।
Tanya को लोगों से कोई परेशानी नहीं थी।
Tanya को दोस्त बनाना भी अच्छा लगता था।
लेकिन Tanya हर किसी के सामने अपने मन की बात आसानी से नहीं रख पाती थी।
किसी नए group में जाते ही Tanya के मन में कई सवाल उठने लगते:
“क्या मैं यहाँ comfortable रह पाऊँगी?”
“क्या लोग मुझे समझेंगे?”
“अगर मैंने अपनी बात सही तरह से नहीं कही तो?”
धीरे-धीरे Tanya ने अपने लिए एक पहचान बना ली:
“मैं Introvert हूँ।”
जब भी कोई Tanya से पूछता कि वह इतनी reserved क्यों रहती है, Tanya के पास एक ही जवाब होता:
“मैं ऐसी ही हूँ... मैं Introvert हूँ।”
लेकिन Tanya के मन में एक बात बार-बार आती थी:
“क्या मैं सच में ऐसी ही हूँ, या मैंने खुद को इसी नाम से पहचानना शुरू कर दिया है?”
Tanya के मन के अंदर बहुत कुछ चलता रहता था।
कभी किसी की कही हुई छोटी-सी बात Tanya पूरे दिन सोचती रहती।
कभी कोई situation uncomfortable लगती तो Tanya उसे किसी से share करने के बजाय अपने मन में ही रख लेती।
कभी-कभी Tanya को अकेलापन महसूस होता।
लेकिन Tanya यह समझ नहीं पा रही थी कि उसे अपने स्वभाव को समझने की जरूरत है या अपनी परेशानी को किसी के साथ बाँटने की।
फिर Tanya की College Journey शुरू हुई।
College की दुनिया अलग थी।
नई जगह, नए लोग, presentations, group projects, discussions और अपने भविष्य को लेकर कई सवाल।
Tanya के पास ideas थे।
Tanya के सपने थे।
Tanya में talent भी था।
लेकिन कई बार Tanya का self-doubt उसकी अपनी आवाज़ से पहले पहुँच जाता।
एक presentation के दिन Tanya के हाथ काँप रहे थे।
उसने पूरी तैयारी की थी।
लेकिन जैसे ही Tanya सबके सामने खड़ी हुई, उसके मन में वही सवाल आने लगे:
“अगर मैं ठीक से नहीं बोल पाई तो?”
Tanya कुछ पल चुप रही।
फिर उसने गहरी साँस ली और अपनी बात शुरू की।
आवाज़ शुरुआत में धीमी थी, लेकिन हर शब्द के साथ Tanya का confidence बढ़ता गया।
Presentation खत्म हुई।
तालियाँ बजीं।
Tanya ने पहली बार महसूस किया:
“मुझे किसी और जैसा बनने की जरूरत नहीं है।
मुझे सिर्फ खुद पर भरोसा करना सीखना है।”
उस दिन Tanya ने अपने बारे में एक नया सच जाना।
Introvert होना Tanya की कमजोरी नहीं था।
हाँ, Tanya को अपनी feelings समझने, अपनी बात कहने और जरूरत पड़ने पर मदद माँगने की कला सीखनी थी।
फिर Tanya की Office Journey शुरू हुई।
Office में भी Tanya सबसे ज्यादा social person नहीं थी।
लेकिन अब Tanya खुद को लेकर परेशान नहीं होती थी।
Meeting में Tanya पहले situation समझती, लोगों की बातें सुनती और फिर अपनी राय रखती।
एक दिन office की एक महत्वपूर्ण meeting में पूरी team एक समस्या का समाधान खोज रही थी।
कई ideas आए।
Tanya काफी देर तक सबकी बातें सुनती रही।
फिर Tanya ने कहा:
“मेरे पास एक idea है...”
Tanya ने अपना पूरा विचार सामने रखा।
कुछ देर की चर्चा के बाद पूरी team ने Tanya के idea पर काम करने का फैसला किया।
उस project की सफलता के बाद Tanya के manager ने Tanya से कहा:
“Tanya, तुम्हें अपनी personality बदलने की जरूरत नहीं थी।
तुम्हें सिर्फ अपनी strength पहचानने की जरूरत थी।”
Tanya मुस्कुराई।
जिस लड़की ने कभी सोचा था कि शायद उसमें कुछ कमी है,
आज वही Tanya अपने काम, अपने विचार और अपनी पहचान के साथ खड़ी थी।
Tanya की जीत यह नहीं थी कि Tanya Introvert से Extrovert बन गई।
Tanya की असली जीत यह थी कि Tanya ने खुद को स्वीकार करना सीख लिया।
अब Tanya Introvert शब्द से डरती नहीं थी।
Tanya जानती थी:
उसे हर जगह सबसे ज्यादा बोलने की जरूरत नहीं है।
उसे हर व्यक्ति के साथ तुरंत comfortable होने की जरूरत नहीं है।
उसे सिर्फ अपनी बात कहने से खुद को रोकना नहीं है।
और जब Tanya के मन में कोई परेशानी होती है, तो वह उसे अकेले सहने के बजाय भरोसेमंद व्यक्ति से बात करती है।
आज के समय में teenagers और youth के बीच Introvert शब्द बहुत सुनने को मिलता है।
लेकिन हमें यह समझना होगा:
Introvert होना कोई मानसिक बीमारी नहीं है।
हर Introvert युवा परेशान नहीं होता।
लेकिन अगर कोई Tanya की तरह अपने मन की परेशानियों को लगातार दबाता रहे, अकेलापन महसूस करे, खुद को दूसरों से कम समझने लगे या अपनी feelings share न कर पाए, तो उसके emotional well-being और mental health पर ध्यान देना जरूरी है।
बच्चों और युवाओं को बदलने से पहले उन्हें समझना जरूरी है।
उनसे यह पूछना जरूरी है:
“तुम इतने चुप क्यों हो?” नहीं,
बल्कि:
“तुम्हारे मन में क्या चल रहा है?”
क्योंकि हो सकता है Tanya को दुनिया बदलने की जरूरत ही न थी।
उसे सिर्फ यह समझने की जरूरत थी कि:
उसकी अपनी एक दुनिया है,
उसकी अपनी एक आवाज़ है,
और उसकी अपनी एक पहचान है।
हर किसी को भीड़ में अपनी जगह बनाने की जरूरत नहीं होती।
कभी-कभी अपनी पहचान के साथ खड़े होना ही सबसे बड़ी जीत होती है।